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| Rahul Gandhi files his party presidency papers on 4th December 2017. Picture: Twitter |
गुजरात चुनाव में राहुल गांधी के लगभग हर भाषण सुन रहा हूँ. राहुल अपने समकक्ष नेताओं में सबसे समझदार, पढ़े लिखे और सामने वाले को सुनने में यकीन रखने वाले हैं. अपने परिवार में राहुल पांचवें सदस्य हैं. जो कांग्रेस की बागडोर सम्भालने जा रहे हैं. लेकिन, राहुल के सामने कोई आसान चुनौती नहीं है. ये आजादी के पहले भी थी और गांधी की हत्या के बाद विकराल रूप में उभरकर सामने आई.
हालांकि तब समाज को नेतृत्व देने वाले नेता आज के नेताओं के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर थे. उनकी सोच एक बेहतर समाज रचने की थी, जहां शांति और भाईचारा हो. लक्ष्य एक वैज्ञानिक समाज बनाने की थी. हर कांग्रेस अध्यक्ष के सामने अलग-अलग चुनौती रही है, लेकिन उन सबकी चुनौतियों में जो कॉमन है वो थी साम्प्रदायिकता.
गांधी की हत्या के बाद साम्प्रदायिकता ने अपना फन फैला लिया था, लेकिन उसके मुकाबले के लिए हमारे पास नेहरू की अगुआई में ऐसे बहुत सारे नेता थे जो समाज को दिशा दे सकते थे, साम्प्रदायिकता का फन कुचल सकते थे. आज की तरह समाज बंटा हुआ नहीं था. प्रधानमंत्री समेत कोई नेता हिन्दू मुसलमान की बात नहीं कर रहा था. बल्कि देश की बात करता था तो सब लोग आते थे. श्मशान और कब्रिस्तान जैसा बंटवारा नहीं था. आज का समय बिल्कुल अलग है.
आज सम्प्रदायिकता चरम पर है. समाज को बांटने वाले लोग संवैधानिक पदों पर बैठे हुए हैं. लोगों के मस्तिष्क में जहर भरा जा रहा है. गाय और बीफ के नाम पर लोगों का झुंड दलित और मुसलमान को पीट पीट कर मार दे रहा है. लेकिन किसी भी नेता के माथे पर शिकन नहीं है. वो अपना वोटबैंक देख रहा है. उसे ये नहीं दिख रहा कि समाज टूट रहा है. देश टूट रहा है. वो चाहता है कि उसका वोटबैंक बना थे.
राहुल के सामने देश को साम्प्रदायिकता के कुंड में झोंके जाने से बचाने की चुनौती है. साम्प्रदायिकता से इस देश का जितना नुकसान हुआ है. उतना किसी और ने नहीं किया है. लेकिन ये चुनौती अब कहीं ज्यादा जटिल है. साम्प्रदायिकता इस लोकतंत्र में अपनी पैठ गहरे तक जमा चुकी है. संवैधानिकता का चोला ओढ़ चुकी है और जनमानस में खुद के राष्ट्रवादी होने का ढोंग रही और भक्त बने लोगों को यकीन है कि यही हमारे दाता हैं. लेकिन ये दाता समाज में जहर बो रहे हैं. राहुल के सामने इसी साम्प्रदायिकता से लड़ने की चुनौती है. जो स्पष्ट रूप से तो नहीं दिखती लेकिन समाज में प्रबल रूप में मौजूद है.
राहुल के लिए ये मुश्किल इसलिये है कि कांग्रेस में जमीनी नेताओं की संख्या बहुत कम है. जनता में पकड़ बनाये रखने वाले नेता अब नहीं है. राहुल के कंधों पर अब कांग्रेस का बोझ है. उन्हें कांग्रेस का जीर्णोंद्धार करना है और समाज को बांटने वाली ताकतों से लड़ना है.
राहुल के लिए ये काम तभी आसान हो सकता है जब वे समाज बनाये. कांग्रेस को लेकर समाज के बीच जाए. सड़क पर उतरे और खेत खलिहानों में जाये. लोग जुड़ेंगे तो कांग्रेस खड़ी होगी और उसमें लोगों को अपना प्रतिबिम्ब दिखेगा. गांधी, नेहरू और मौलाना आज़ाद की कांग्रेस तभी एक बार फिर से पूरे भारत में आकार ले पाएगी. समाज के साथ खड़े हुए बिना कांग्रेस नहीं खड़ी हो पाएगी.

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