बबुआन लोगों की दबंगई का प्रतिरोध ना कर पाना उसकी मजबूरी थीं या कुछ और. लेकिन नील टीनोपाल में रंगे कुर्तों वाले बबुआनों में से कौन जनेऊ पहनता है और कौन नहीं वो गिन के बता देती. यूं भी मुहल्ले की कथित सभ्य औरतें उसे कुलटा और खनगीन जैसे शब्दों से नवाज चुकी थी. और उसे अपवाद मान पूरा गांव दूध का धुला बनता. खेती हमेशा से घाटे का सौदा रही है. वो शहर क्या गई..बस्ती में बलात्कार, छेड़छाड़ और जबरदस्ती का ग्राफ बढ़ गया. झक सफेद कुर्तों पर अब नीले धब्बे उग आए थे.
गंगा का पानी हूं। बहता रहता हूं