10 फरवरी को इलाहाबाद की सड़कों पर जाम में फंसी बड़ी दीदी का फोन आया, तो खबर मिली कि मेरे घरवाले कुंभ में श्रद्धा की डुबकी लगा चुके हैं। फिर अचानक दिमाग में कौंधा कि आज मौनी अमावस्या है..लेकिन मैं तो चूक गया, अगर कुंभ जाने का मौका मिला होता, तो कुछ लिखा जाता। लेकिन अफसोस जा नहीं पाएं.. फिर याद आया कि अरे, अपने राणा जी यानि अविनाश के मोबाइल में तो वो कुंभ वाली कैलाश गौतम की कविता है ना, क्यों ना उसे दियारा पर फैलाया जाए उन लोगों के लिए जो यहां आते है और अपने पदचाप छोड़ जाते हैं। आइए, क्यों ना मौनी अमावस्या के दिन कुंभ में मची गहमागहमी को इलाहाबाद के मशहूर रेडियो प्रस्तोता और कवि कैलाश गौतम की नजर से देंखे.. हर हर गंगे.. ई भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा धरम में करम में सनल गाँव देखा अगल में बगल में सगल गाँव देखा अमवसा नहाये चलल गाँव देखा.. एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा अ कान्ही पे बोरी, कपारे पे बोरा अ कमरी में केहू, रजाई में केहू अ कथरी में केहू, दुलाई में केहू अ आजी रंगावत हईं गोड़ देखा हँसत हउवैं बब्बा तनी जोड़ देखा ...
गंगा का पानी हूं। बहता रहता हूं