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निजी अनुभव: बोलते ही कहां है हम।

तस्वीरः गूगल
जिसे देखो वही लोन दे रहा है। बैंक वाले, इन्वेस्टमेंट वाले और फलां फलां। ना जाने कौन-कौन। कोई सैलरी पर दे रहा है। कोई प्रॉपर्टी पर दे रहा है। कोई बीमा पर दे रहा है। कोई कार लोन दे रहा है। कोई व्हीकल लोन दे रहा है। कोई बीमा बेच रहा है। सब बेचना ही चाह रहे हैं। दिन भर मोबाइल पर मैसेज और कॉल्स आती रहती हैं। सब बेच ही रहे हैं। लोन दे ही रहे हैं। एक मोहतरमा आज मिली तो पहले प्यार से बतियायीं और फिर बोली अगर किसी को लोन लेना हो तो बताइएगा। हम वेल्थ इनवेस्टमेंट से हैं। करोड़ों का लोन देते हैं। प्रॉपर्टी के अगेंस्ट, भारी मशीन्स के लिए। बड़ी कंपनियों के लिए।

हम सुनते रहे। मन किया कह दे हमको भी लोन चाहिए। दे दीजिए। लेकिन हमारे पास प्रॉपर्टी नहीं है। जमीन नहीं। मशीन नहीं है। हम बड़ी पार्टी नहीं है। लेकिन मेरे पास एक दिल है। अच्छा भला बुरा सोचता है। कविताएं सुनाता है। दर्द पर मरहम लगाता है। अकेले में लोरी सुनाता है। कुछ बोलता नहीं, सिर्फ सुनता है और महसूसता है। कहिए क्या देंगी आप मेरे दिल के अगेंस्ट लोन। एक करोड़। लेकिन हम ना बोले। कसम से हम ना बोले.. क्योंकि जब लोन का बाजार खत्म हो जाएगा तो सिर्फ कविताएं बचेंगी। हम बस उन्हें देखते रहे। लोन..लोन.. लोन..लोन..लोन..लोन.. लोन..लोन.. लोन.. लोन..लोन..लोन..लोन..लोन..लोन.. सनते रहे।

बोलते ही कहा है हम.. कुछ देने वाली सुंदरियों को बस देखते रहते हैं। चाहे वह लोन ही क्यों ना बांटती फिर रही हो। बोल दिए होते तो क्या से क्या ना हो गया होता। बोलते ही कहां है हम।

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