पेट की टीबी की वजह से नौकरी जाती रही, लिहाजा इलाज और
दिल्ली में सरवाइव करने के लिए नौकरी की जरूरत थी। कई जगहों पर रेज्यूमे भेजे और
दोस्तों से भी मदद मांगी। कई जगह नौकरी के लिए हाथ पांव मारने के बाद दिल्ली के एक महत्वपूर्ण अंग्रेजी अखबार में नौकरी का विज्ञापन निकला.. मैंने भी आवेदन कर दिया।
दोस्तों से इस बारे में चर्चा हो रही थी, कई लोगों का कहना
था कि यहां एचआर वाले साक्षात्कार में यह भी पूछते हैं कि आपके पिताजी क्या करते
हैं? घर में कौन-कौन है और क्या आपके परिवार
वाले आर्थिक रूप से आप पर निर्भर हैं?
मैंने कहा, अरे तो ये गजब है। क्या अगर कोई मजदूर का बेटा
है, तो उसे नौकरी नहीं मिलेगी? दोस्तों ने बताया कि
इस कंपनी में पहली पीढ़ी (इसका मतलब ये है कि आप अपने परिवार में पहले आदमी तो
नहीं जो किसी कॉरपोरेट कंपनी में काम करने निकला हो, या ये भी कह सकते हैं कि आप
अपने परिवार में पहले आदमी तो नहीं, जो कॉलेज गया हो) के लोगों को शायद ही पर रखते
हैं। मैंने कहा, देखेंगे।
इंटरव्यू में पत्रकारीय सवालों के बाद एचआर ने सवाल करने
शुरू किए। दूसरा सवाल यही था कि आपके पिताजी क्या करते हैं। मेरे चेहरे पर मुस्कान
आ गई और मैंने मन ही मन कहा, ‘मुझे इसी की उम्मीद
थी’। खैर, एचआर महोदया दूसरे सवाल की ओर बढ़ी और इंटरव्यू
पूरा हुआ।
कमरे पर आने के बाद दोस्तों ने पूछा, कैसा रहा साक्षात्कार? मैंने ठीक रहा। उन्होंने पूछा, क्या-क्या पूछा? मैंने सब बताया और कहा कि वो भी पूछा, जो तुम लोग कह रहे थे, लेकिन मैं
लंगड़ी मार गया इस सवाल को, क्योंकि बिना राजनीति के इस देश में कुछ सधता नहीं है।
मैं कहता हूं ईमानदारी और वफादारी एक झूठ है। उसने पूछा आपके पिताजी क्या करते
हैं। मैंने कहा कि हमारी हार्डवेयर की शॉप है और वे उसी को चलाते हैं। उन्होंने
कहा, ठीक है भाई साहब आप खेल कर गए। वरना वो लोग आपको पेडिंग लिस्ट में डाल देते।
मैंने कहा कि देखो यार महाभारत जिसने पढ़ी है ना उसे
युधिष्ठिर और द्रोणाचार्य के बीच अश्वत्थामा मारा गया के प्रसंग वाली बातचीत याद
होगी। अगर मैं एचआर महोदया से कह देता कि मैं एक मजदूर का बेटा हूं और मेरा बाप 60
रुपया रोज कमाता है, तो शायद मैं इंडियन मीडिया की सामंतवादी और पूंजीवादी
व्यवस्था में फिट नहीं बैठता। और मेरे लिए तो नौकरी जीवन और मरण का सवाल थी, तो
मैंने भी या नरो वा कुंजरो.. कह दिया। बाकी की जै जै हो।
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