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| Courtesy_Social Media |
डियर R
अब जबकि तुमसे प्रेम करते हुए मैं अकेला पड़ गया हूं। तुम्हें पाने की मेरी बेचैनी और बढ़ गई है। लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरा प्रेम तुम्हारे आड़े आए, किसी भी तरह। फिर भी मैं तुम्हें हमेशा याद करता हूं। रात-दिन, सुबह-दोपहर-शाम और भोर में भी। तुम जानती हो कि भोर मुझे कितना पसंद है, जब मैं तुम्हारी बाहों में समा जाता था और तुम मुझे अपने भीतर डूब जाने देती। दिन के हर पहर तुम्हें सोचता हूं कि तुम्हें फोन कर लूं। शायद, थोड़ी राहत मिल जाए, लेकिन फिर सोचता हूं कि अगर फोन कर लिया तो फिर खुद को संभाल पाना और तुमसे फासला रख पाना मुश्किल हो जाएगा। तुम्हें याद करने की आवृत्ति और बढ़ जाएगी और फोन करने का सिलसिला भी। हालांकि मुझे नहीं पता कि तुम्हें मेरा ख्याल आता भी है या नहीं।
दर्द और कचोट भी है.. तुम्हें बांहों में ना भर पाने की और मुझे इससे पार पाना ही होगा। तुम्हें खुलकर प्यार कर पाना अब शायद ही संभव हो, लेकिन प्यार तो बना ही रहेगा। चाहे हमारे दरम्यान कितना भी फासला बढ़ जाए। ये सिर्फ तुम जानती हो कि मैं तुम्हें घनघोर प्यार करता हूं और मैं जानता हूं कि तुम्हारे दिल में मेरे लिए बहुत कुछ था। जो तुम कभी कह नहीं पाई, जब भी मैंने पूछा, तुम खामोश रही, मुझे देखती रही और साथ-साथ चलने लगी। मैं अपनी आधी अधूरी कविताएं पढ़ता और तुम उन्हें दोहराती। मैं कितनी बार अपनी कविताओं में .. 'मैं तुमसे प्यार करता हूं'.. जोड़ देता कि तुम दोहराओगी। तुम दोहराती भी, लेकिन 'करता' को 'करती' नहीं बोलती। फिर भी मेरे लिए इतना ही काफी था।
आजकल मैं अपनी आधी अधूरी कविताएं पढ़ता हूं और खुद ही दोहराता हूं। कंप्यूटर खोलकर इधर-उधर झांकता हूं ताकि मन बहल जाए, लेकिन मन तो कहीं और रमा हुआ है। आज की शाम फेसबुक देख रहा था तो मेरे पसंदीदा कवि गीत चतुर्वेदी की एक कविता मिली। मैंने इस एक बार, दो बार और कई बार पढ़ा.. और पढ़ते हुए मेरी आंखें भर आईं। ये कविता यहां लगा रहा हूं। अगर तुम कभी मेरे ब्लॉग पर आओ तो इसे पढ़ना और हो सके तो मुझे मुक्त कर देना।
कविता का प्रतिबिंब
हममें इस तरह का जुड़ाव था
कि आंखें अलग-अलग होने के बाद भी
हम एक ही दृष्टि से देख सकते थे
इसीलिए ईश्वर ने हमें जुड़ने का मौक़ा दिया
हम इस क़दर अलग थे
कि एक ही उंगली पर
अलग-अलग पोर की तरह रहते थे
इसीलिए ईश्वर ने हमें अलग कर दिया
हम जुड़े
इसका दोष न तुम्हें है न मुझे
हम अलग हुए
इसका श्रेय न तुम्हें है न मुझे
ऐसे मामले में
ईश्वर को मान लेने में कोई हर्ज नहीं
जी हल्का रहता है
हम जुड़वा थे
हममें से एक तालाब किनारे लेटी देह था
और दूसरा पानी से झांकता प्रतिबिंब
देह ने पानी में कूदकर जान दे दी.
प्रतिबिंब उछलकर पानी से बाहर निकला
और मर गया.
दीग़र है यह
कि हम कभी तय नहीं कर पाए
कौन देह था, कौन प्रतिबिंब.
- गीत चतुर्वेदी
सबद ब्लॉग से साभार

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