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FRUSTATION

बाहर बहुत ठंड थी, चुभती हवा गलियों में सांय सांय करती हुई मंडरा रही थी, एहितयातन लोग अपने घरों के दरवाजे बंद कर रजाइयों में दुबके पड़े थे। ऑफिस से आने के बाद वो फर्श पर पड़े गद्दे पर पसर गया.. बैचलरों के कमरे में बेड का होना मुश्किल होता है.. ग्राउंड फ्लोर का फर्श भी बर्फ सा लग रहा था। उसे चाय की तलब लगी। वो किचन में घुस गया..

फर्स्ट फ्लोर पर हलचल हुई.. वो चाय बनाने में मशगूल था.. लगा कोई ऊपर के टॉयलेट में है.. मकान की बनावट कुछ ऐसे थी कि ऊपर कुछ भी हो नीचे पता चल ही जाता था.. चूड़ी, पायल की आवाजों से उसने अंदाजा लगा लिया कि रात के दो बजे ऊपर कौन जगा है.. चाय का कप लेकर वो अपने बिस्तर पर आया तो नींद आंखों से दूर थी.. वो सोने की कोशिश में पंखें को घूरने लगा.. लेकिन पंखे की तरह उसकी कल्पनाएं भी रुकी हुई थीं.. ऊपर फिर खटखट हुई और उन्हीं आवाजों के साथ वो अपनी फैंटेसी को कमरे की दीवारों के कैनवास पर उकेरने लगा...  

22-01-2013

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