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गाजीपुर

...गाजीपुर के पुराने किले में अब एक स्कूल है, जहां गंगा की लहरों की आवाज तो आती, लेकिन इतिहास के गुनगुनाने या ठंडी सांसें लेने की आवाज नहीं आती। किले की दीवारों पर अब कोई पहरेदार नहीं घूमता, न ही उन तक कोई विद्यार्थी ही आता है, जो डूबते सूरज की रोशनी में चमचमाती हुई गंगा से कुछ कहे या सुने। 
गंदले पानी की इस महान धारा को न जाने कितनी कहानियां याद होंगी। परंतु मांएं तो जिनों, परियों, भूतों और डाकुओं की कहानियों में मगन हैं और गंगा के किनारे न जाने कब से मेल्हते हुए इस शहर को इसका ख्याल भी नहीं आता कि गंगा के पाठशाले में बैठकर अपने पुरखों की कहानियां सुनें। 
यह असंभव नहीं कि अगर अब भी इस किले की पुरानी दीवार पर कोई आ बैठे और अपनी आंखें बंद कर ले, तो उस पार के गांव और मैदान और खेत घने जंगलों में बदल जाएं और तपोवन में ऋषियों की कुटियां दिखाई देने लगें। और वह देखे कि अयोध्या के दो राजकुमार कंधे से कमानें लटकाये तपोवन के पवित्र सन्नाटे की रक्षा कर रहे हैं। 
लेकिन इन दीवारों पर कोई बैठता ही नहीं। क्योंकि जब इन पर बैठने की उम्र आती है, तो गजभर की छातियों वाले बेरोजगारी के कोल्हू में जोत दिये जाते हैं कि वे अपने सपनों का तेल निकालें और उस जहर को पीकर चुपचाप मर जाएं। 
लगा झूलनी का धक्का,
बलम कलकत्ता चले गये।
                                                                                          .......................... आधा गांव में राही मासूम रज़ा 

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