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Short Story: निकालो.. देख क्या रहे हो


शाम का समय था। हल्की बरसात हुई थी, लेकिन अब भी आसमान में बादल घिरे हुए थे। वह उसे देखने की चाहत लिए अपने घर से निकला। उसे यकीन था वह अपने बगीचे में होगी। बेचैन सा वह तेज कदमों से चलने लगा, दो कदम चलने के बाद हल्की सी दौड़ लगा लेता। ताकि जल्दी पहुंचा जा सके। उसने दूर से ही देखा कि बगीचे के झुरमुट में कोई खड़ा हैं। वह तेजी से बढ़ता गया।

उसे पता ही नहीं चला कि वह कब उस बगीचे के पास आ गया। जहां बेर के पेड़ लगे थे। वो बगीचे के इस कोने से उस कोने तक टहलती मचल रही थी। कभी इस पेड़ पर देखती, कभी उस डाल पर, उसने ठिगने से अमरुद की डाली को उछलकर पकड़ना चाहा कि पैरों में बेर का कांटा चुभ पड़ा। वह रो पड़ी..आह करते हुए..कांटा निकालने की जगह कांटे को देखकर रोती रही। वह बगीचे को घेरने के लिए लगे काटों के बाड़ के समीप खड़ा था। कांटा चुभने से वह बैठ गई थी। इसलिए वह बाड़ के घेरे पर ही खड़ा हो गया, उसने देखा तो कुछ नहीं बोला, आंसू पोंछने लगी।

मूक सहमति पाकर वह उसके समीप गया। लेकिन उसके पैरों को छूने की हिम्मत ना कर सका। यूं ही देखता रहा। उसने मासूमियत से कहा, कांटा चुभ गया है..उसने देखा तो कांटा गहरा धंसा हुआ था, हाथ बढ़ाया तो हाथ कांपने लगे। वह उसके सामने कमजोर पड़ रहा था, जिसने सामने वह सबसे मजबूत दिखना चाहता था। निकालो देख क्या रहे हो..उसने कांटा पकड़ा..कभी उसकी ओर देखता, कभी कांटे की ओर..धीरे-धीरे कांटे को खींचने लगा, वह और चिल्लाने लगी। उसने झट्टाक से कांटा खींच दिया..वह दर्द के मारे दोहरी हो गई और वह कांपते हुए उसे देखता रहा..बगल वाले बगीचे में सिसकती आवाज को देखने के लिए बाड़ के किनारे खड़े दसियों लोग अब मुस्कुरा रहे थे।

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