उस छोटे से आशियाने में जगह बनाते हुए आज सारी चीजें
अपनी जगह पर खड़ी थी। मानो उन्हें किसी के आने का पूर्वाभास हो। लेकिन उसका सेलफोन
खामोश था। वह निराश मन से उठा और पानी पीने के लिए गिलास भरने लगा। अचानक मुड़ा कि
गिलास उसके हाथों से उछलकर जमीन पर आ गिरा..चंद सेकेंडों में गिलास के साथ वह भी
उछलने लगा..उसके अंर्तमन में उसके मां की आवाज गूंज रही थी। “बेटा, जब भरा हुआ पानी का
गिलास गिर जाए तो समझ लो, कोई आने को हैं”। गिलास और उसके उछलने के
बीच डोरबेल की घंटी आवाज दे रही थी मिलन के बंद दरवाजे को खोलने के लिए..
केदारनाथ अग्रवाल की कविता एक हथौड़े वाला घर में और हुआ! हाथी-सा बलवान, जहाजी हाथों वाला और हुआ! सूरज-सा इंसान तरेरी आँखों वाला और हुआ! एक हथौड़े वाला घर में और हुआ! माता रही विचार, अंधेरा हरने वाला और हुआ!! दादा रहे निहार, सबेरा करने वाला और हुआ।। एक हथौड़े वाला घर में और हुआ! जनता रही पुकार सलामत लाने वाला और हुआ सुन ले री सरकार कयामत ढाने वाला और हुआ!! एक हथौड़े वाला घर में और हुआ!
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