मुझे तुम्हारी आवाज से
प्यार है। मैं जानता हूं कि तुम मुझे नापसंद करती हो। लेकिन तुम्हारी आवाज बहुत
मासूम और दिल की अच्छी है। वह तुम्हारी तरह मुझे देखकर नफरत से उफ्फ़ नहीं करती
हैं। हां, जब खामोश हो जाती हो तो वह तुम्हारे उफ्फ़ करने का इंतजार करती है।
ताकि हल्के से खुले तुम्हारे लबों से निकलकर वह मेरे सीने से लिपट जाएं और तुम ये
फैसला ना कर सको कि तुम्हें मुझसे नफरत करनी है या अपने ही उफ्फ़ से ?
केदारनाथ अग्रवाल की कविता एक हथौड़े वाला घर में और हुआ! हाथी-सा बलवान, जहाजी हाथों वाला और हुआ! सूरज-सा इंसान तरेरी आँखों वाला और हुआ! एक हथौड़े वाला घर में और हुआ! माता रही विचार, अंधेरा हरने वाला और हुआ!! दादा रहे निहार, सबेरा करने वाला और हुआ।। एक हथौड़े वाला घर में और हुआ! जनता रही पुकार सलामत लाने वाला और हुआ सुन ले री सरकार कयामत ढाने वाला और हुआ!! एक हथौड़े वाला घर में और हुआ!
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें