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यूपी विधानसभा चुनाव का सारांशः 10 प्वाइंट

Courtesy_Social Media
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जीत ने विपक्षी पार्टियों को कई मोर्चों पर सबक सिखाया है। चुनाव प्रबंधन, कम्युनिकेशन, जातीय गणित और राजनीतिक समीकरणों को बीजेपी ने बड़ी चालाकी से सेट किया और अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। इस चुनाव परिणाम के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह 'न्यू इंडिया' का जनादेश है। 'न्यू इंडिया' के इस जनादेश ने यूपी की बदलती राजनीति की कई गिरहें खोल दी हैं। या यूं कहें कि बदलती राजनीति की तस्वीर बिल्कुल साफ कर दी है। इस जनादेश के बाद यूपी की राजनीति के नए कोण उभर कर सामने आ रहे हैं।

1. कांशीराम के लिए बहुजनों ने एक नारा दिया था। 'कांशीराम तेरी नेक कमाई, तूने सोती कौम जगाई...' यह यथार्थ है कि कांशीराम और बसपा ने यूपी में दलितों और पिछड़ों की राजनीति कर उन्हें सत्ता में भागीदार बनाया लेकिन 2017 के जनादेश ने यह साफ कर दिया है कि कांशीराम ने जिस कौम को जगाया था उसे अब भूख लगी है। 1984 में बसपा के गठन और 93 में बीएसपी की पहली साझा सरकार के बाद आप अनुमान लगा सकते हैं कि कितने वर्ष गुजर गए। यूपी और खासकर पूर्वांचल में जहां दलितों की एक बड़ी आबादी है, विकास अब भी नहीं पहुंचा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के दावों पर लोगों ने भरोसा किया है, क्योंकि इसी पूर्वांचल के लोग गुजरात जाकर नौकरी करते हैं और वहां का 'विकास' देखा है। दलितों और पिछड़ों के बार बीजेपी को वोट करने में इस यथार्थ का अहम रोल रहा है। बीएसपी के सत्ता में रहने के बावजूद दलित और पिछड़ों की हैसियत में कोई बदलाव नहीं आया है। वे अब भी आर्थिक रूप से कमजोर हैं और रोजगार के लिए अब भी दूसरे राज्यों की ओर रूख करते हैं। हां, उनमें राजनीतिक जागरूकता आई है और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा भी, इसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने की आस में 2017 में दलित-पिछड़े बीजेपी की ओर मुड़ गए हैं।

2. 2007 के विधानसभा चुनावों के दौरान बसपा की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव आया। यह वो दौर था जब ब्राह्मण यूपी में सत्ता का भागीदार बनने के लिए पार्टी तलाश रहे थे। 2004 से पहले बीजेपी की सरकार में उन्होंने भाग लिया, उसके बाद मुलायम के साथ गए और अब उन्होंने बसपा को साधा। इसके लिए मायावती ने भी अपनी राजनीति में बदलाव करते हुए बड़ा फैसला लिया। जिस ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद के खिलाफ बसपा अपनी पूरी राजनीति करती रही उसे त्याग कर उन्होंने दलित-ब्राह्मण समीकरण बनाया और इसके जरिए सत्ता में पहुंचीं। मायावती के वफादार समर्थक को इस समीकरण को समझने में देर लगी या कह सकते हैं कि उसने इंतजार किया, अपने लिए मौके का...।

3. 2007 के बाद 2017 तक के दरम्यान 10 सालों में बसपा के समर्थकों का एक धड़ा यह समझ गया था कि अगर हमारी पार्टी में ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और बनिया आकर टिकट ले सकते हैं और विधायक बन सकते हैं। बसपा को चलाने में हिस्सेदार बन सकते हैं, तो हम क्यों नहीं। इसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए बसपा का एक बड़ा वोट बैंक इस बार के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की ओर मुड़ा है। बीजेपी ने इन समुदायों के प्रवाह को बिल्कुल सहजता के साथ खुद में समाहित किया है और सत्ता की कुर्सी पर कब्जा जमा लिया है।

4. यूपी की राजनीति में अब तक यह होता रहा है कि बीजेपी सोनकर, कुशवाहा, बिंद और राजभर जैसी जातियों को टिकट नहीं देती थी। बीजेपी ने नीति निर्माता अपने समुदाय को टिकट देते थे और सोचते थे कि सरकार बना लेंगे लेकिन इस चुनाव ने साबित कर दिया कि बिना दलितों-पिछड़ों के यूपी में सरकार नहीं बन सकती। अमित शाह और मोदी ने जोड़ी ने इसे समझा और बसपा के वोटबैंक में सेंध लगा दी। पूर्वांचल के जिस इलाके से मैं आता हूं बीजेपी ने किसी भी भूमिहार या पंडित को टिकट नहीं दिया। उसने सोनकर, बिंद और राजभर को टिकट दिए। बीजेपी को पता था कि उसका कोर वोटर (ब्राह्मण, बनिया, राजपूत और भूमिहार) उसके साथ है। उसने दलितों और पिछड़ों को वोट दिया और उनके वोट अपने पाले में खींच लिए। चुनावी गणित सेट करन में माहिर अमित शाह यह काम बखूबी किया।

5. आजादी के 70 सालों बाद भी यह देश जाति और धर्म से ऊपर नहीं उठ पाया है। यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने सबसे पहले जाति समीकरण फिट किए और फिर तीसरे चरण के चुनाव के बाद धर्म का कार्ड चल दिया। पूर्वांचल तक पहुंचते-पहुंचते चुनाव का ध्रुवीकरण हो चुका था। यूपी के दलित और पिछड़े सेक्युलर होने से पहले हिंदू हैं और यह सत्य है। बीजेपी के ध्रुवीकरण वाले कार्ड को इन तबकों का जोरदार समर्थन मिला। 2014 के बाद बीजेपी ने टिकट बंटवारे के जरिए यह साफ कर दिया है कि उसे मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए। मुसलमान इस बार भ्रम की स्थिति में था और उसका वोट बंट गया। कहा तो यह भी जा रहा है कि तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं ने बीजेपी को वोट दिया है। यानि धर्म की राजनीति में बीजेपी ने बाजी मार ली। बीएसपी का 100 के करीब मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देना उसके खिलाफ गया। इस बार के यूपी चुनावों में बीजेपी की सेना में कोई दलित-पिछड़ा-सवर्ण नहीं था। सब हिंदू थे और यह काम कर गया।

6. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने यूपी चुनाव के लिए 10000 व्हाट्स ऐप ग्रुप बनाए थे। व्हाट्स ऐप कौन यूज करता है। नई पीढ़ी जो युवा है। पहली या दूसरी बार मतदान वोट डाले हैं। इनकी आबादी एक करोड़ों में है और बीजेपी ने सोशल मीडिया के जरिए इस पीढ़ी को खूब ब्रेनवॉश किया है। दस हजार व्हाट्स ऐप ग्रुप का एक मैसेज करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है। 2014 के चुनाव के बाद बीजेपी ने यूपी पर फोकस किया और लोगों का ब्रेन वॉश करना शुरू किया। किसी भी व्यक्ति का ब्रेन वॉश करने के लिए तीन साल का समय काफी होता है। इतिहास बोध से वंचित युवा पीढ़ी ने इस बार जमकर बीजेपी को वोट दिया है। बाकी विपक्षी पार्टियों के पास बचे बूढ़े और अधेड़ वोटर... जीतता वही है जो जवान होता है।

7. यूपी की सियासत को व्यक्तित्व के नजरिए से देखें, तो एक समय पूर्वांचल से बड़े नेता निकले और यूपी की सियासत को चलाते रहे। वीर बहादुर सिंह, कल्पनाथ राय, कमलापति त्रिपाठी और रामनरेश राजभर जैसे नेता निकले, लेकिन मायावती और मुलायम के उभार में पूर्वांचल के नेता उठ नहीं पाए। नेता तो पूर्वांचल में थे, लेकिन यूपी की सियासत के पहले पन्ने पर उभर नहीं पाए। पूर्वांचल की राजनीति को कोई चेहरा नहीं था। यह लठैतों में, बाहुबलियों में और दिल्ली शिफ्ट कर गए नेताओं में बंटी थी। बीजेपी ने 2014 से ही इस पर फोकस किया। पहले नरेंद्र मोदी को बनारस से लड़ाकर पूर्वांचल की राजनीति को उनके इर्द गिर्द लपेटा और फिर यूपी चुनाव में यहां के स्थानीय नेताओं (राजनाथ सिंह, मनोज सिन्हा, केशव प्रसाद मौर्य, कलराज मिश्र, महेंद्र पांडे, अनुप्रिया पटेल) को मैदान में उतारा। बीजेपी ने जनता को यह बताया कि ये आपके इलाके के लोग है और अगर यूपी में बीजेपी सरकार बनती है, तो चहुंओर तेज रफ्तार से विकास होगा।

8. मुलायम सिंह, अखिलेश यादव, मायावती, शिवपाल यादव का ताल्लुक पश्चिमी उत्तर प्रदेश से है। सैफई का विकास सबको दिखता है, लेकिन पूर्वांचल की बदहाली किसी को नहीं दिखती। सपा और बसपा के नेताओं की प्राथमिकता में कभी पूर्वांचल रहा भी नहीं। अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल के आखिर में बलिया तक एक्सप्रेसवे की घोषणा की, लेकिन घोषणा तो मायावती ने भी की थी। लोगों ने मायावती को खारिज कर दिया और अखिलेश को भी। अखिलेश की अपनी उलझनें थी और जब तक वे उससे बाहर आते बहुत देर हो चुकी थी। पूर्वांचल की बदहाली के लिए इन नेताओं को जिम्मेदार मानते हुए जनता ने अपनी प्राथमिकता से हटा दिया।

9. यह जगजाहिर है कि बीजेपी कम्युनिकेशन टूल का सबसे बेहतर इस्तेमाल करती है। सोशल मीडिया हो या व्हाट्स ऐप ग्रुप... बीजेपी ने अपनी योजनाओं का मौखिक रूप से भी काफी बढ़िया इस्तेमाल किया और लोगों को इनके बारे में रटा दिया। नोटबंदी और उज्जवला योजना के बारे में हर किसी को पता है कि इसके क्या लाभ है और देश का कितना भला होगा। घर-घर जाकर लोगों से बीजेपी कार्यकर्ताओं ने लोगों को केंद्र की मोदी सरकार की हर योजना के बारे में बताया है। चुनाव परिणाम वाले दिन अखिलेश यादव ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि बीजेपी ने लोगों के दरवाजे बंद कराके कहा है कि नोटबंदी का पैसा गरीबों को मिलेगा। कहने का आशय यह है कि अपनी घोषणाओं, योजनाओं को जुमलों को लेकर बीजेपी लोगों के पास पहुंची है। अन्य दल ऐसा करने में नाकाम रहे हैं। बीएसपी तो इस मामले में काफी पीछे रही, सोशल मीडिया पर भी उसकी उपस्थिति बहुत देर में हुई।

10. सबसे ऊपर मोदी.. किसी भी प्रधानमंत्री ने अभी तक विधानसभा चुनावों में जमीन पर उतर कर गली-गली घूम कर प्रचार नहीं किया था। मोदी ने लोगों को एक बार फिर विश्वास दिलाया है कि वो यूपी की किस्मत बदल सकते हैं और लोगों ने उन पर विश्वास किया है। नोटबंदी के बाद गरीबों को लगा है कि उनके साहूकार और धन्नासेठों का पैसा मोदी ने मिट्टी में मिला दिया है। कड़ी आलोचनाओं पर आंसू बहाने वाले प्रधानमंत्री ने केंद्र में रहकर भले ही कुछ खास न किया हो, नोटबंदी का फैसला लेने के सिवाय, लेकिन जनता को अपने तरीके से लुभाने में सफल रहे हैं। उनके व्यक्तित्व का करिश्मा अब असरकारक है और जनता को उनसे बड़ी उम्मीदें है।

याद आता है अखिलेश का यादव का वो बयान कि जब तक कोई उनसे बेहतर काम नहीं करता.. यूपी में उनका काम बोलेगा। बीजेपी के सामने अखिलेश से बेहतर और लंबा एक्सप्रेसवे बनाने की चुनौती है, लेकिन क्या बीजेपी के घोषणा पत्र में इसका जिक्र था...। एक बार फिर से बीजेपी का घोषणा पत्र पलटने का समय आ गया है।

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