बुक रिव्यूः गुलज़ार का पहाड़े गिनना.. पन्द्रह पांच पचहत्तर

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एक स्कूल था जो ढह गया था. मलबे पर छोटे छोटे बच्चे टाट पर बैठे पहाड़े गिन रहे थे. पन्द्रह एकम पंद्रह..पंद्रह दूनी तीस.... ‘पन्द्रह पांच पचहत्तर’. बाजुएं झटक झटक कर बच्चे पहाड़े गिन रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे कविता पढ़ रहे हो. वाणी प्रकाशन ने 2010 में ‘पन्द्रह पांच पचहत्तर’ नाम से गुलजार की कविताओं का संग्रह प्रकाशित किया है. इस संग्रह में पन्द्रह पाठ है और हर पाठ में पांच कविताएं. गुलज़ार का फलक बहुत बड़ा है. जिसमें वो पूरी कायनात समेट लेते हैं. वो सौरमंडल का चक्कर काट आते हैं तो इराक से लेकर अफगानिस्तान तक की खाक छानते हैं. वो इराक की खानम की गवाही देते हैं तो गुजरात के उन मकानों का भी जो मलबे का ढेर बन गए. देखिए...

कितने मासूमों के घर दंगों में जलकर
मलबे का ढेर हुए जाते हैं गुजरात में
...और ये है,
एक टूटे हुए रोज़न में इसे
तिनके सजाने की पड़ी है!
बाजू एक जुलाहे का, हिलता है अब तक
कांप रहा है या शायद कुछ कात रहा है
टांग है एक खिलाड़ी की...रन आउट हुआ है.
घर तक दौड़ते दौड़ते राह में मारा गया.

कहते है दीवारों के कान होते हैं लेकिन गुलजार इन दीवारों को जुबां भी देते हैं...

सूरज की इस बैकलाइट में घर के खंडहर...
और दीवारों पर बैठे अफगानी बच्चे,
अमरीका के ‘आर्ट जर्नल’ के कवर पेज पर
अब भी जिंदा लगते हैं!
हल्का हल्का धुआं निकलता रहता है!!
एक टैंक अचानक घर में घुस आया था
जुमेरात के दिन, थोड़ी-सी, जो भी मिली, दफना आए हम!
अब ख़ानम की फिक्र न करना अब्बू तुम!!

लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव में नेताजी लोग जब अपने अपने देवता पहचान रहे थे.. गुलजार उनकी पोल कुछ यूं खोलते हैं.

एक पहाड़ी के कोने में
बस्ते जितनी बस्ती थी इक
बटवे जितना मंदिर था, वो भी लॉकिट जितनी
नींद भरी दो बांहों जैसे मस्जिद के मीनार गले मंदिर के
दो मासूम खुदा सोए थे!
इक बूढ़े झरने के नीचे!!

स काव्य संग्रह में गुलज़ार एक नए अक्स में दिखते हैं. उनका कैनवास बहुत बड़ा है और रोजमर्रा की छोटी छोटी मगर मानीख़ेज बातों को उठाकर वह एक नया लैंडस्केप रच देते हैं. अपनी अंगुलियों के पोरों से जब वह संवेदनाओं के धागे बुनते है तो हर कोई बिछ जाता है. शायद यही गुलजार की खासियत भी है.

बारिश होती है जब
तो इन गारे पत्थर की दीवारों पर
भीगे भीगे नक्शे बनने लगते हैं
हिचकी हिचकी बारिश तब..
पहचानी सी एक लिखाई लिखती है
बारिश कुछ कह जाती है.

शहर की डकैती में गायब होते बच्चों को लेकर हमारे समय का अज़ीम शायर क्या कहता है..

तैने ये भी देखा होगा,
शहर को छापे मारने की आदत है, मेघा
शहर डकैती करे तो बच्चे जेब में भर के ले जाता है
बच्चे बिक जाते हैं जैसे रेहड़ी पर भुट्टे बिकते हैं.

पंद्रह पांच पचहत्तर में गुलजार ने भूख और विस्थापन पर भी जमकर कलम चलाई है. वो खुदा को बे-सब्रा बच्चा कहते है और उस बच्चे के बराबर बिठा देते हैं जो भूख से बिलबिला रहा है.

काल माई ने
नीले रंग के, गोल से इक सय्यारे पर
ये कह के खुदा को छोड़ दिया
बे-सब्रा है ये, जल्द बड़ा हो जाएगा!!
काल मां चूल्हे पर हांडी रखके, कब से बैठी है
कच्चे दाने गल जाएं और एक उबाला आ जाए!
ये बे-सब्रा बच्चा बैठा
ऊंगली रख के गोल कटोरी के अंदर
गोल गोल थाली पर तेज घुमाता है

सरदार डैम की वजह से विस्थापन के शिकार हुए लोगों को भी गुलज़ार ने अपनी कलम दी है.

तीन पहाड़ों बीच बनी इस वादी में
बंध बनेगा!
डेम बनेगा!
तीन पहाड़ों में से रेंगता, बल खाता जो सदियों से बहता आया है
कुंडली मार के बैठेगा वो दरिया अब इस वादी में

इसी किताब में अशोक वाजपेयी कहते हैं कि अगर आज के समय में गुलज़ार सबसे ज्यादा प्यार पाने वाले कवियों और शाइरों में से एक है तो इसलिए कि उनकी कविताओं में रवायत का बोझ नहीं है. वो एक बार एक ही चीज कहते हैं और उनकी कविताओं में उतावलापन नहीं है. उनकी कविताओं में अपनी दुनिया या अनुभव को हम अनुगुंजित पाते हैं.

उजड़ गए
तमाम शब जली है शमा हिज्र की..
उम्मीद भी बची है तो बस इतनी
जितनी एक बांझ कोख की उम्मीद हो

गुलजार के यहां हर चीज जुबान लिए होती है. और जब बोलती है तो ‘आसमान की कनपट्टियां पकने लगती हैं’. 'धूप का टुकड़ा लॉन में सहमे हुए एक परिन्दे की तरह बैठ जाता है'..'यहां तक कि मुझे मेरा जिस्म छोड़कर बह गया नदी में.' नदी, आसमान, परिन्दे क्या यथार्थ नहीं है. और यही वास्तविकता है जिसे गुलज़ार ने अपनी और हमारी जिंदगियों में से टुकड़ा टुकड़ा उठा लिया है.

कभी कभी जब उतरती है चील शाम की छत से 
थकी थकी सी जरा देर लॉन में रुककर
सफेद और गुलाबी, ‘मसुंडे’ के पौदों में घुलने लगती है
कि जैसे बर्फ का टुकड़ा पिघलता जाए व्हिस्की में
मैं ‘स्कार्फ़’ दिन का गले से उतार देता हूं
तेरे उतारे हुए दिन पहनके अब भी मैं
तेरी महक में कई रोज काट देता हूं!!

यह भी..

मुझे मेरा जिस्म छोड़कर बह गया नदीं में!
अब उस किनारे पहुंच के मुझको बुला रहा है
मैं इस किनारे पे डूबता जा रहा पैहम
मैं कैसे तैरूं बगैर उसके!!
मुझे मेरा जिस्म छोड़कर बह गया नदी में!!

... आखिर में बस इतना ही कहेंगे कि अपनी कविताओं के माध्यम से जब गुलज़ार ‘दुआएं फूंकते हैं’ तो उनके चाहने वालों को ‘हिचकी’ आने लगती है.

14-05-2014

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