बुक रिव्यू: इस्लाम की बुनियाद पर लोकतंत्र खड़ा करना चाहते हैं इमरान


दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इमरान खान की पहचान एक क्रिकेटर के तौर पर है. तेज गेंदबाजी का ककहरा जानने वाला छोटा बच्चा भी इमरान खान की बात करता है. लेकिन इमरान खान जब बचपन के दिनों में क्रिकेट खेलते थे, तो उनकी ख्वाहिश जन्नत में क्रिकेट खेलने की थी. वो परिवार के बड़ों से अक्सर ये सवाल पूछा करते थे कि ‘क्या मैं जन्नत में क्रिकेट खेल सकूंगा, क्या मैं वहां बंदूक चला सकूंगा.’ जन्नत में खेलने और बंदूक चलाने की बात उलझन पैदा करती है और इमरान की राजनीति भी. क्रिकेट के मैदान से निकलकर अस्पताल के गलियारे से राजनीति में उतरे इमरान खान के जीवन की ये पहली तस्वीर है. 

इमरान की कल्पना में एक ऐसा लोकतंत्र है जिसकी बुनियाद इस्लाम पर टिकी है. या फिर एक ऐसा लोकतंत्र जिसकी फुनगियों पर इस्लाम का परचम लहरा रहा हो. लेकिन इमरान अपने इस इस्लामी लोकतंत्र को परिभाषित कर पाने में असफल नजर आते हैं. इस्लाम और लोकतंत्र दो अलग चीजें हैं. इस्लाम जहां पैगंबर की बात करता है. वहीं लोकतंत्र में लोग महत्वपूर्ण होते हैं. उनके चुनाव, अपनी बात रखने की आजादी, आलोचना और अपने तरीके से जीने की मर्जी. लोग अपने हिसाब से पहनना, ओढ़ना चाहते है. जबकि इस्लाम कहता है कि आप तयशुदा तरीके से जीवन जिएं. ऐसे में इमरान की इस्लामी लोकतंत्र की कल्पना समझ में नहीं आती है. शायद पाकिस्तान के लंगड़े लोकतंत्र के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है क्योंकि इमरान से पहले पाकिस्तानी शासकों ने इस्लामी लोकतंत्र के ख्वाबगाह को जमीन पर उतारने की कोशिश कई बार की. पाकिस्तान के वर्तमान हालात को जानने के बाद इस्लामी लोकतंत्र की हकीकत समझ में आने लगती है. इमरान अपने देश की राजनीति के बिगड़े स्वरूप को सुधारने का मकसद रखते हैं.


तालिबान से बातचीत का समर्थन
मूलतः अंग्रेजी में लिखी गई एक महान किक्रेटर के जीवन की दास्तान ‘पाकिस्तान: अ पर्सनल हिस्ट्री’ के अनुवादित संस्करण ‘मैं और मेरा पाकिस्तान’ में इमरान खुद अपने बीते हुए कल की कहानी सुनाते चलते है. 246 पन्नों की इस पूरी कहानी में इमरान अपनी इस्लामिक पहचान और आध्यात्मिक संसार के चक्कर काटते रहते है इससे एक दोहराव पैदा होता है और आखिर तक चलता है. हालांकि इस दौरान बीच बीच में कुछ ऐसे किरदार आते रहते है. जो भविष्य में होने वाली घटनाओं की कुंजी इमरान को सौंपते रहते है.

पाकिस्तान में इमरान को तालिबान समर्थक के तौर पर जाना जाता है. हालांकि इसके लिए वह पाकिस्तान की अंग्रेजी मीडिया को जिम्मेदार ठहराते है. हाल के दिनों में शरीफ सरकार और तालिबान के बीच बातचीत का जो सिलसिला शुरू हुआ है. उसकी वकालत इमरान एक लंबे समय से करते रहे हैं. अपना और अपने देश का इतिहास लिखते हुए इमरान जब तालिबान और अलकायदा के बारे में बताते है तो उनके शब्दों के चयन से स्पष्ट समझ आता है कि तालिबान के प्रति इमरान का झुकाव है. सोवियत संघ के खिलाफ कबाय़ली लड़ाकों को अमेरिका द्वारा प्रशिक्षण दिया जाना और फिर दशक भर बाद इन्हीं लड़ाकों को दुनिया के लिए खतरनाक बताते हुए युद्ध छेड़ देना या फिर 9/11 के बाद पूरी दनिया में मुसलमानों के खिलाफ अमेरिका के युद्ध छेड़ने की अप्रत्यक्ष मुहिम का इमरान ने खुली मुखालफत की है. इसके अलावा अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों के सामने पाकिस्तान का घुटने टेक देना इमरान को सालता है. यह पूरा अध्याय पाठक को बांध के रखता है.

3A के साथ सत्ता का गठजोड़
1996 में गठित राजनीतिक पार्टी तहरीके इंसाफ को कई परेशानियों सामना करना पडा. जिसके केंद्र में इमरान रहे. 1997 के चुनावों में पार्टी को कोई सीट नहीं मिली, जबकि 2002 में एक सीट मिली. हालांकि तब से लेकर आज 12 बरस हो चुके है और बहुत सारे पाकिस्तानी तहरीके इंसाफ को एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं. बकौल इमरान पाकिस्तान में एक कहावत है कि पाकिस्तान में वही राज कर सकता है जिसके साथ 3A हो यानि अल्लाह, आर्मी और अमेरिका. पाकिस्तान के लोगों को राजनीतिक विकल्प देने के लिए प्रयासरत इमरान के साथ अल्लाह तो हैं लेकिन आर्मी और अमेरिका नहीं. इमरान जिस लोकतंत्र का ख्वाब देख रहे हैं उसमें सेना की भूमिका सीमा पर है. तो दूसरी ओर वह अमेरिका के खिलाफ खड़े नजर आते हैं. ये अलग बात है कि जब वो अपने लोकतंत्र की बात करते है तो पश्चिमी संस्थाओं और उनके सेकुलरिज्म की बात करते है. वहीं, लगे हाथ अपनी परंपराओं और सामाजिक ढांचे को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए पश्चिमी जीवन शैली की आलोचना करते है. अमेरिका से पहले तहरीके इंसाफ की कामयाबी के रास्ते में आर्मी खड़ी है और कुर्सी के साथ उसकी साझेदारी को तोड़ने के लिए इमरान को नई रणनीति बनानी होगी. ताकि जनता का भरोसा जीता जा सके.


जेमिमा के साथ पार्टनरशिप
पाठक के नजरिए से देखे तो इमरान की निजी जिंदगी के बारे में जानने की इच्छा सबसे ज्यादा हिलोरें मारती है. अपने जमाने के दिग्गज क्रिकेटर ने अपनी पत्नी जेमिमा खान के बारे में एक अध्याय लिखा है. लेकिन यह बेहद संक्षिप्त है. इसमें कुछ भी नया नहीं है. पाठक की दिलचस्पी दोनों के रिश्ते की गहराई में जाने की होती है. लेकिन निजी जिंदगी की पिच पर इमरान अपना विकेट बड़ी चतुराई से बचा ले जाते हैं. वे कहते हैं कि जेमिमा के साथ उनकी पार्टनरशिप बेहद सुलझी रहीं.


जिंदगी के शुरूआती साल पश्चिम में गुजारने वाले इमरान खान वहां की राजनीतिक व्यवस्था से प्रभावित तो नजर आते हैं. लेकिन क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद जैसे जैसे वह पाकिस्तान में रहना शुरू करते हैं उनमें इस्लाम, कबायली मूल्यों और पहनावों को लेकर श्रेष्ठता का अहं पैदा होता है जिसे वे जायज ठहराते है. हालांकि दुनिया भर में एक चीज देखने में आती है कि अगर व्यक्ति अपनी संस्कृति और मूल्यों के प्रति दृढता का भाव रखता है तो उसे अपने ही देश में दक्षिणपंथी करार दे दिया जाता है. पाकिस्तान की अंग्रेजी मीडिया द्वारा इमरान को तालिबान समर्थक के रूप में पेश किए जाने के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है.
अपने देश की आजादी के पांच बरस बाद पैदा हुए इमरान की कहानी दरअसल एक के बाद दूसरा लक्ष्य हासिल करने की गाथा है. जिनसे प्रेरणा ली जा सकती है. क्रिकेट में एक मुकाम हासिल करने के बाद अपनी मां की याद में इमरान ने कैंसर अस्पताल बनवाने के लिए जिस तरह का जुझारूपन दिखाया है वह प्रेरित करता है. अस्पताल के लिए झुग्गी झोपड़ी वालों का चंदा देना, करियर के अहम दौर में चोटिल होने के बाद वापसी करना, विश्व कप में लड़खड़ाती टीम को विजेता बनाने वाला करिश्माई नेतृत्व प्रेरित करता है. तमाम परेशानियों से लड़ते हुए अपने देश का पहला कैंसर अस्पताल बनवाना फिर एक स्कूल और उसके बाद पेशावर और कराची में दो अस्पताल बनवाने का लक्ष्य.. ये बताने के लिए काफी है कि इमरान ने अपनी जिंदगी में क्या हासिल किया है.

राजनीति संग रोमांस
राजनीति के साथ इमरान का रोमांस रोचक बन पड़ा है. नवाज शरीफ, बेनजीर भुट्टो के बारे में छोटी छोटी जानकारियां बांध के रखती हैं. वेस्टइंडीज दौरे पर नवाज शरीफ का इमरान को हटाकर खुद कप्तानी और ओपनिंग करने का किस्सा दिलचस्प है. दुनिया के धाकड़ गेंदबाजों का सामना करने के लिए जब मुदस्सर नज़र पैड, थाई, सपोर्टर, हेलमेट और तमाम सुरक्षा के उपायों से लैस थे. नवाज पैड और कैप में कैरेबियाई अटैक का सामना करने के लिए उतावले थे. इधर, ड्रेसिंग रूम में इमरान इस चिंता में डूबे हुए थे कि एंबुलेंस तैयार या नहीं.

पाठक जिस इमरान को जानते है उसके बनिस्बत ‘मैं और मेरा पाकिस्तान’ तहरीके इंसाफ के नेता कि एक मुकम्मल तस्वीर पेश करती है. किसी अन्य भाषा से अनुवादित किताबों में प्रूफ की गलतियां अब आम बात हो गई हैं. ये किताब भी कोई अपवाद नहीं है. ज्यादातर वाक्यों में की जगह ‘करी’ लिखा गया है. जो पाठक का स्वाद खराब कर देती है.

4 मई 2014
Nandlal Sharma
http://aajtak.intoday.in/ ke liye Likha gaya Book Review.



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