मैं तैरना चाहता हूं.

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लड़कपन में
जब मैं तैरना नहीं जानता था
गंगा के कोल में
सीखता था
तमाम कोशिशों के बाद
जब सब बेचैन हो जाते
एक सुर में कहते
तू ये जलभंवरा पी ले
तैरना सीख जाएंगा
जैसे ये भागता है
पानी की सतह पर..

जवानी में
मैं बह रहा हूं
अनोखे बहाव में
जो मुझसे शुरू होता है
मेरे भीतर से
उठता है खुशी का एक भाव
चेहरे पर गंभीरता लिए
मन में छा जाता है

तुम्हारा नाम
अंतः मस्तिष्क में टकराता है
लेकिन मैं सिर्फ बहना नहीं चाहता
तैरना चाहता हूं
बावजूद इसके कि लड़कपन में सीख नहीं पाया
तैरना..

गंगा के बहाव की तरह
मैं तैरना चाहता हूं
तुम्हारे आकर्षण में
चहकते अंर्तमन में गूंजती
तुम्हारी प्रतिध्वनियों के बीच
स्थिर होकर
लहरों पर दौड़ते भंवरे की तरह
जिसके बहाव का वेग
नियंत्रित और अनियंत्रित होता है
बिना बताए तुम्हें...
मैं तैरना चाहता हूं..

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