अरारो के साए में

इस बेचैनी का कोई सिरा नहीं है
..तुम यूं ही उलझती जा रही हो

यूं ही रात ख्यालों में फिरते रहे
..तुम आई तो घुंघरू बिखरे मिले

यूं चुपके से आना ठीक ना था
मोहल्ला, तुम्हारी फिक्र में करवटें बदलता है

फासले का सिरा थामे..
हम तुम खड़े है.. अरारो के साए में

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