मैं चलता रहा..

ये कुछ ऐसा था
जैसे, खेत की पगडंडियों पर चलना
गहरे, उथले और गड्ढ़ों से भरे मेड़ पर चलना
पावों में ओस की शीतलता का अहसास होना
लेकिन, नाजुक दूबों की शरारत भरी चुभन ना थी
हल्की फुहारों के बाद
सपाट कठोर पत्थरों की तरावट में
मैं चलता रहा..

दूर जुते हुए खेतों में
कुछ बच्चे
मिट्टी के ढेलों पर बैठे थे
उनके हाथों में बांस की छिटकुन थी
वे निशाना साध रहे थे
चट्टान नुमा बड़े ढेलों पर
कुछ भैंसे बबूल की छाल खा रही थी
मैं चलता रहा...

वह  पीपल का पेड़
जो बचपन में बहुत डराता था
मुर्दों को पानी पिलाता था
अपने गले में बंधे घंट से
जिससे सूत के सहारे पानी की बूंदे टपकती
टप टप टप...
सर मुड़ाए पांच लोग
घूम रहे थे पीपल के चारों ओर
गोल गोल गोल..कुछ बुदबुदाते हुए
मैं चलता रहा...

वह, गांव की ड्योढ़ी पर
लौटते बाढ़ का कोलाहल था
क्वार की धूप में मछलियां
देखकर, बच्चों का ताली बजाना
महीनों भीगे हुए खेत का धूप सेंकना
हर पहर के बाद गीली आंखों से
दादू का लौटते बाढ़ को नापना
जैसे, भीगे हुए खेत में
घुटनों तक धंसते पांव को संभालकर चलना
मैं चलता रहा...



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