दस रुपए की चूड़ी


पूरा मुहल्ला जग उठा है कराहें सुनकर
आह..आह
ये बहन, अधेड़ मां
और मुहल्ले की नई दुल्हन की आह है
जो आज फिर मार खाई है अपने हत्यारे पति से

वो रोज गांजा, शराब पीकर
गला दबाता और केरोसिन छिड़कता है
उसका गुनाह सिर्फ इतना भर था
उसने दस रुपए की चूड़ी खरीद ली थी
बिना बताए
अपने हाथों के नंगेपन को दूर करने के लिए

मासूम सी बच्ची दहाड़े मार रही थी
जब वो उसे लहुलुहान कर रहा था
हर रोज मारता और गला दबाता है
पर ना जाने क्यों वह प्रतिकार नहीं करती
क्यों सहती है ये जुल्म
क्यों नहीं फोड़ती है उसका सर

क्या इतना भी हक नहीं है उसका
एक पत्नी है वो एक मां है
कई सालों से झेल रही है वो ये जुल्म
क्या उसके हिस्से में सिर्फ मार है
क्यों अपने हक को चोरी समझ लेती है वो
क्यूं हर बार चुप रह जाती है वो

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